मेव आदिवासी समाज का ही हिस्सा है जो आज भी अपने  हक़ और अधिकार से वंचित है
आरक्षण का लाभ मिलते ही मीणा भूल गए अपने मेव भाइयों को

वसीम अकरम मेव

मेवात एक भौगोलिक क्षेत्र का नाम है | यह पूरा क्षेत्र अरावली पर्वत श्रंखला की पहाडियों से घिरा हुआ है | भाषा वैज्ञानिको के अनुसार मेवों के निवास का नाम मिनावाटी से व्यत्पन्न है जिसका अर्थ है मत्स्य प्रदेश ( मीन गणचिन्ह धारी आदिवासी कबीलाई समुदाय का प्राचीन निवासी स्थान ) विकट आवासीय परम्परा से मेवास भी कहते है | मेव शब्द और मेवात इसी कारण प्रचालन आये | मीना समुदाय की कुच्छ पालो के लोगो ने 11वी शताब्दी में मुस्लिम धर्म धारण कर लिया | परन्तु उनसे रोटी बेटी का सम्बन्ध अकबर काल तक चलता रहा | मेवों का पूर्व निवासस्थान मेवाड़ को माना गया है मेवाड़ का एक प्राचीन परगना मेवल कहलाता है |मेवाड़ का असली नाम भी मेवो की आबादी के कारण मेव+वाड़ अथवा मेवाड़ पड़ा | स्वं बाबर ने भी मेवाड़ के राजा राणा सांगा को हाकिम-ए-मेवात लिखा है |  मीनाओ की हिंदूवादी सोच ,राजनीतिक कारणों व मीनाओ दुवारा मेवो से दूरी बनाने के कारण दूरियां पैदा हुई पर आज भी भाईचारा कायम है | मेवों के भोगोलिक क्षेत्र ,रिवाज,मेव-मीणा का अलग होना और इनकी बहादुरी पर कुछ दोहे

1-दिल्ली सु बैराठ तक,मथुरा पश्चिम राठ, बसे चौकड़ा बीच में,मंझ मुल्ल्क मेवात |

2-मेव न जाणे मांगते, मेवणी नांक नाय विन्धवाये, ये दो अड़ मेवातमें, चली अभी तक आयें |

3-मेव और मीणा एक हा, फिर होगा न्याला, दरियाखां का ब्याहपे, ये भिडगा मतवाला |

4-दिल्ली पै धावो दियो, अपणा-पण के पाण, डरप्या मेवन सु सदा, खिलजी,मुग़लऔर पठाण |

मेवो में 12 पाल और 52 गोत्र है जिनमे से प्रमुख इस प्रकार है - डैमरोत (757 गाँव) ,दुलैत (360 गाँव),बालौत (260 गाँव), देडवाल(देवड़वाल)-252 गाँव, कलेसा(कलेसिया)- 224 गाँव, नाई गोत्र-210 गाँव, सिगल-210 गाँव,देहंगल- 210 गाँव,पुन्ज्लौत-84 गाँव, इनके अतिरिक्त -नांग्लौत,मोर झन्गाला, बमनावत, पाहट(राजा राय भान,टोडर मल और दरिया खां हुए),सौगन, बेसर, मारग, गुमल (गुम्लाडू), घुसिंगा, मेवाल, जोनवाल, चौरसिया, बिगोत, जटलावत,ज़ोरवाल और गोरवाल (हसन खां मेवाती जिसने मुगलों के विरुद्ध खनवा का युद्ध लड़ा) भाभला, गहलोत, खोकर, मीमरोट, कालोत, महर (बलबन के समय मलका महर प्रसिद्द हुए), भौंरायत, पडिहार, बुरिया आदि प्रमुख गोत्र है |

मेवात के वीरों पर रिसर्च

महर्षि दयानन्द यूनिवर्सिटी में इतिहास की शोध छात्रा रहीं शर्मिला यादव ने '1857 के विद्रोह के पश्चात दमन चक्र: मेवात का एक अध्ययन' नाम से अपनी एक रिसर्च में लिखा है कि ‘20 सितंबर 1857 को अंग्रेजों ने दिल्ली पर कब्ज़ा कर लिया था और उन्हें हरियाणा में मौजूद मेव विद्रोही खटक रहे थे. दिल्ली पर कब्जे के बाद पूरे एक साल तक अंग्रेजी सेना ने  हरियाणा में दमन किया. 8 नवंबर 1857 को अंग्रेजों ने मेवात के सोहना, तावडू, घासेडा, रायसीना और नूंह सहित सैकड़ों गांवों में कहर बरसाया था.

अंग्रेजों की कुमाऊं बटालियन का नेतृत्व लेफ्टिनेंट एच ग्रांट कर रहे थे. यह दस्ता कई गांवों को तबाह करता हुआ गांव घासेड़ा पहुंचा. जहां 8 नवंबर को गांव के खेतों में अंग्रेज और मेवातियों के बीच जबरदस्त लड़ाई हुई. इसमें घासेड़ा के 157 लोग शहीद हुए, लेकिन जवाबी कार्रवाई में उन्होंने अंग्रेज अफसर मेकफर्सन का कत्ल कर दिया.



19 नवंबर 1857 को मेवात के बहादुरों को कुचलने के लिये ब्रिगेडियर जनरल स्वराज, गुड़गांव रेंज के डिप्टी कमिश्नर विलियम फोर्ड और कैप्टन डूमंड के नेतृत्व में टोहाना, जींद प्लाटूनों के अलावा भारी तोपखाना सैनिकों के साथ मेवात के रूपडाका, कोट, चिल्ली, मालपुरी पर जबरदस्त हमला बोल दिया. इस दिन अकेले गांव रूपडाका के 425 मेवाती बहादुरों को बेरहमी से कत्ल कर दिया गया.





इन शहीदों को श्रद्धांजलि देते हुए इतिहास के पन्नों को पलटिए तो यहां के ज्यादातर गांवों में वतनपरस्ती (Nationalism) की एक से बढ़कर एक मिसाल मिलेंगी. मेवात में रणबांकुरों की देशभक्ति और कुर्बानियों की गाथाएं भरी पड़ी हैं.







रूपडाका गांव के 425 लोगों को तो अंग्रेजों ने गोली मार दी थी, जबकि अलग-अलग घटनाओं में विद्रोह की वजह से 470 मेवातियों को उनके अपने गावों में फांसी पर लटका दिया गया. दस गांवों को अंग्रेजों ने जला दिया था. उन शहीदों (Martyr) की याद में यहां के गई गांवों में मीनारें बनवाई गई हैं, जो आज भी यहां के लोगों की देशभक्ति की गौरवगाथा बयां कर रही हैं.



1857 में आजादी की पहली लड़ाई से लेकर आजादी मिलने तक के संघर्ष में यहां के लोगों ने अपना बलिदान देते हुए अदम्य साहस का परिचय दिया है. लेकिन, इस वक्त यहां के लोगों को सिर्फ खास चश्मे से देखा जाता है. इस क्षेत्र के रहने वाले पहलू खान, उमर मोहम्मद, तालिम और अकबर उर्फ रकबर को गो-रक्षा के नाम पर पीट-पीटकर मार डाला गया.



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मुस्लिम बहुल मेवात के लोगों ने अंग्रेजों से लोहा लिया.

मेव मुस्लिमों से बदला चाहते थे अंग्रेज



गुड़गांव गजेटियर (Gurgaon Gazetteer) के मुताबिक में मेव मुसलमानों (Meo Muslims) ने साल 1800  के शुरुआत से ही अंग्रेजों की नाक में दम कर रखा था. वर्ष 1803 में अंग्रेज-मराठों के बीच हुए लसवाड़ी के युद्ध में मेव छापामारों ने दोनों ही सेनाओं को नुकसान पहुंचाया और लूटपाट की थी. अंग्रेज इससे काफी नाराज थे, तभी से मेवातियों को सबक सिखाने के लिए मौके का इंतजार कर रहे थे.



साल 1806 में नगीना के नौटकी गांव के रहने वाले मेवातियों ने मौलवी ऐवज खां के नेतृत्व में अंग्रेज सेना को काफी नुकसान पहुंचाया. इस हार से अंग्रेज घबरा गए और दिल्ली के रेजीडेंट मिस्टर सेक्टन को सन 1807 में अपने अधिकारियों को एक पत्र के जरिए समझाया कि मेवातियों के साथ समझौता कर लेना चाहिए. हालांकि, यह अंग्रेजों की चाल थी और वो सही समय का इंतजार कर रहे थे, जो मौका उन्हें नवंबर 1857 में मिल गया.



बताया जाता है कि 10 मई 1857 को चांद खान नामक मेवाती सैनिक ने अंग्रेजों पर गोलियां बरसा दी थीं. बाद में विरोध की यह आग पूरे देश में फैल गई. दरअसल, साल 1806 की  लड़ाई के बाद से ही मेवात के किसानों पर अंग्रेजों के जुल्म बढ़ने लगे थे.



हुड्डा ने अपनी किताब में किया है जिक्र



संविधान निर्मात्री सभा के सदस्य रहे स्वतंत्रता सेनानी रणवीर सिंह हुड्डा के पुत्र एवं हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह ने अपनी पुस्तक ‘विकास की उड़ान अभी बाकी है’ में मेवातियों की वीरता का विस्तार से जिक्र किया है.



हुड्डा लिखते हैं, 'मई 1857 की जो क्रांति बैरकपुर से शुरू हुई थी वो 12 मई को मेवात पहुंच चुकी थी. तावडू, घासेड़ा, नूंह, पिनगवां और पुन्हाना में अंग्रेजों के खिलाफ बगावत का आगाज हुआ. मेवात के आसपास के दर्जनों गांवों के लोगों ने अंग्रजों के खिलाफ मोर्चा संभाल लिया. इस बात की भनक जब अंग्रजी हुकूमत को लगी तो वायसराय ने कैप्टन डूमंड नायक की अगुवाई में रूपडाका गांव को घेरने के लिए फौज भेज दी. 19 नवंबर 1857 को फौज ने गांव पर धावा बोल दिया, लेकिन यहां के जांबाजों ने डटकर मुकाबला किया. इस गांव के 400 से अधिक शहीद हो गए.'



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1857 की क्रांति में मेवो का महत्वपूर्ण योगदान है लगभग 1000 मेव शहीद हुए थे | रूपड़ा का गाँव में 1857 में अंग्रेज समर्थक राजपूत और मेवो में घमासान युद्ध हुआ था जिसमे अंग्रेजो और राजपूतो की संयुक्त सेना से लड़ते हुए 400 मेव शहीद हुए थे | मेव आदिवासी समाज का ही हिस्सा है जो आज भी हक़ और अधिकार से वंचित है |

भारत सरकार द्वारा घोषित   विमुक्त जातियों ( डीनोटिफाईड ट्राइब्स) व घुमन्तू जातियों (नोमेडिक कम्यूनिटीज) के कल्याणार्थ चलायी जा रही योजनाओं का लाभ प्रदान किये जाने विषयक शासनादेश संख्या-899 (ए) / XXVI- 700 (5) / 1959 दिनांक 12.05.1961 में प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में निवास करने वाली कतिपय 11 जातियों यथा बंजारा, भर, दलेरे कहार, गंडीला, घोसी (हिन्दू) केवट, मल्लाह, लोध, मेव (मेवाती) औधिया व तगाभाट को सूचीबद्ध किया गया है। अनुवर्ती शासनादेश संख्या-148-बी/ XXVI-700(5)/1959 दिनांक 26.03.1962 पूर्व निर्गत शासनादेश संख्या-899 (ए)/ XXVI-700 (5)/1959 दिनांक 12.05.1961 के क्रम में जारी किया गया है, जिसमें प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में निवास करने वाले कतिपय 18 अन्य जातियों यथा मुसहर, नट, पासी, दुसाध, गूजर, कंजर, खटीक, बरवार, बौरिया, भंतू, हबुरा, सांसिया, करवल, अहरिया, बदक, बेरिया, चमार व डोम को भी विमुक्त जातियों की सूची में परिगणित/समायोजित किया गया। कर्मिनल ट्राइब एक्ट वाली जातियों में मेव समाज भी मीणाओ की तरह शामिल था ,लेकिन मीणाओ ने आरक्षण का पूरा लाभ उठाया व अपने भाइयों मेवो को उनके हाल पर छोड़ दिया ,जो आज देश में सबसे पिछडी जाति बन चुकी है अपने अधिकारों से वंचित हो चुकी है जिस क्राइम से मीणाओ ने आरक्षण का लाभ लेकर पीछा छुड़ा लिया वही नअनुसूचित जनजाति व अनुसूचित जनजाति में आरक्षण न मिलने की वजह से मेव आजतक पीछा नही छुड़ा पाये ! 

नहीं मिला  मेवो को आरक्षण का लाभ

यद्यपि विमुक्त एवं घुमंतू जनजातियों में से बहुतों को अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति या ओबीसी की सूची में सम्मिलित किया गया और बहुत सी विमुक्त एवं घुमंतू जनजातियों को इनमें से किसी भी आरक्षित श्रेणी में नहीं रखा गया है. जबकि पूर्व गठित कमेटियों एवं आयोगों ने स्पष्ट रूप से इन जनजातियों को एक विशिष्ट वर्ग माना था.

यहां तक कि पूर्व योजना आयोग भी इनके लिए अलग से बजट का आवंटन करता था किंतु अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल किए जाने से इनको आरक्षण एवं अन्य किसी सुविधा का कोई लाभ नहीं मिल सका.

इसका सबसे बड़ा कारण था कि यह सर्वाधिक पिछड़े विमुक्त समुदाय प्रतियोगिता में अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति एवं अन्य पिछड़ा वर्ग के अभ्यर्थियों के साथ मुकाबला ही नहीं कर सके.

परिणामत: इनके हिस्से की नौकरियों को एवं इनके उत्थान के लिए आवंटित की गई धनराशि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं अन्य पिछड़ा वर्ग की संपन्न जातियां हड़पती रही हैं.

मेव समाज को जहँ अनुसूचित जनजाती में आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए था वहाँ इसे अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल कर अधिकारों से वंचित कर दिया गया,क्योकि जो जाति पहले से पिछड़ी है वह अन्य पिछड़ा वर्ग में सम्पन्न जातियों का मुकाबला कैसे कर सकती है यही कारण है मेव समाज शिक्षा व राजनीतिक में पिछड़ गया, इन्हें आगे लाने के लिये सरकार अनुसूचित जनजाति में शामिल करें और अलग से सुविधा दे तब जाकर कुछ सुधार हो सकता है ! 

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