निगरानी #लोकतंत्र को दीमक की तरह खोखला कर देती है; हैकिंग निगरानी का यंत्र है, पारदर्शिता नहीं-शेखर दीक्षित
निगरानी #लोकतंत्र को दीमक की तरह खोखला कर देती है; हैकिंग निगरानी का यंत्र है, पारदर्शिता नहीं

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सार्वजनिक ज़िंदगी बिताने वाले, चाहे #नेता हो या पत्रकार, #जज या #चुनाव आयोग के #कमिशनर, सभी लोगों के प्रति जवाबदेह हैं। लेकिन जवाबदेही के लिए पारदर्शिता चाहिए। हैकिंग निगरानी का यंत्र है, पारदर्शिता नहीं। जब उनका फोन हैक होता है, तो उनकी निजी ज़िंदगी की जानकारी का, उन्हें काबू में रखने में इस्तेमाल हो सकता है। मसलन, यदि किसी सरकारी मुलाज़िम या #पत्रकार को होम लोन की ज़रूरत है और हैकर (इस किस्से में सरकार हैकर है) को यह जानकारी मिल जाए तो वह इसके आधार पर उन्हें मदद देने का वादा करके, अपने पक्ष में खबर करवा सकते हैं, निर्णय दिलवा सकते हैं। यदि आपने दोस्त से, बॉस की बुराई की हो, तो इस जानकारी को आपके खिलाफ इस्तेमाल किया जा सकता है।

#पेगासस कांड की वजह से यह चर्चा हो रही है। लेकिन इसके अलावा निगरानी के कई यंत्र है। #गूगल, #वॉट्सएप, #फ़ेसबुक, यह सब गुप्त तरीके से हमारी जानकारी प्राप्त करते हैं, इससे मुनाफ़ा कमाते हैं (आपकी पसंद-नापसंद के आधार पर विज्ञापन दिखाकर) और कभी-कभी आपकी जानकारी सरकार के साथ साझा करते हैं। सबसे भयावह बात यह है कि निजी कंपनियों का मुनाफ़ा नागरिकता और लोकतंत्र को कमज़ोर करने से कमाया जा रहा है।

जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए स्वतंत्र सोच और काम अहम है। ऐसी निगरानी से यह बुरी तरह प्रभावित होते हैं। निगरानी से शासन-अनुशासन, प्रजा-नागरिक, जवाबदेही-गुलामी की रेखा मिटने लगेगी। जवाबदेही लोकतंत्र को मज़बूत बनाती है और निगरानी दीमक की तरह खोखला कर देती है।

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